Thursday, 23 July 2015

राजीव दिक्सित जी के सभी व्याख्यान ऑनलाइन सुने।

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Monday, 20 July 2015

राजीव भाई के व्याख्यानॉ की वीडियो डी.वी.डी. (MP-4)

 राजीव भाई के व्याख्यानॉ की वीडियो डी.वी.डी. (MP-4)


राजीव भाई के व्याख्यानों की वीडियो डी.वी.डी. (MP-4)
वीडियो डी.वी.डी. डाक द्वारा आपने घर पर मंगवाने के लिए संपर्क करें 08380027016, 08380027022 (सोमवार से शनिवार 11 बजे से 6 बजे तक )


ड.वी.डी.




वीडियो डी.वी.डी. डाक द्वारा आपने घर पर मंगवाने के लिए संपर्क करें 08380027016, 08380027022 (सोमवार से शनिवार 11 बजे से 6 बजे तक )
10 जोतवानी लेआउट, सेवाग्राम रोड , वर्घा, 442102 महाराष्ट्र
Feb 02, 2015

परस्पर विरुध्द आहार

 परस्पर विरुध्द आहार

राजीव भाई


1 दूध और कटहल का कभी भी एक साथ सेवन नहीं करना चाहिये ।

2. दूध और कुलत्थी भी कभी एक साथ नहीं लेना चाहिए।

3. नमक और दूध (सेंधा नमक छोड़कर) दूध और सभी प्रकार की खटाइयां, दूध और मूँगफली, दूध और मछली, एक साथ प्रयोग ना करें।

4. दही गर्म करके नहीं खाना चाहिये हानि पहुँचती है, कढ़ी बनाकर खा सकते हैं।

5. शहद और घी समान परिणाम में मिलाकर लेना विष के समान है।

6. जौ का आटा कोर्इ अन्न मिलाये बिना नहीं लेना चाहिए।

7. रात्रि के समय सत्तू का प्रयोग वर्जित है, बिना जल मिलाये सत्तू ना खायें।

8. तेज धूप में चलकर आने के बाद थोड़ा आराम करके ही पानी पियें, व्यायाम या शारीरिक परिश्रम के तुरन्त बाद पानी ना पियें या थोड़ी देर बाद पानी पियें और भोजन के प्रारम्भ में पानी पीना वर्जित है।

9. प्रात:काल भोजन के पश्चात तेज गति से चलना हानिकारक है।

10. शाम को खाने के बाद थोड़ी देर चलना आवश्यक है, खाना खाकर तुरन्त सो जाना हानिकारक है।

11. रात्रि में दही का सेवन निषेध है, भोजन के तुरन्त बाद जल का सेवन निषेध है। दिन में भोजन के बाद मठ्ठा और रात्रि में भोजन के बाद दूध लेना लाभदायक होता है। वात के रोगों में ब्लड एसिडिटी, कफ वृद्धि या संधिवात में दही ना खायें।

12. शौच क्रिया के बाद, भोजन से पहले, सर्दी-जुकाम होने पर, दांतों में पीव आने पर और पसीना आने की दशा में पान का सेवन नहीं करना चाहिए।

13. सिर पर अधिक गर्म पानी डालकर स्नान करने से नेत्रों की ज्योति कम होती है जरूरत पड़ने पर गुनगुने पानी से स्नान कर सकते हैं।

14. सोते समय सिर पर कपड़ा बांधकर सोना, पैरों में मोजे पहनकर सोना, अधिक चुस्त कपड़े पहनकर सोना हानिकारक है।

15. शहद कभी भी गर्म करके ना खायें, छोटी मधुमक्खी का शहद सर्वोत्तम होता है।

16. तेज ज्वर आने पर तेज हवा, दिन में अधिक देर तक सोना, अधिक परिश्रम, स्नान, क्रोध आदि से बचना चाहिये।

17. नींद लेने से पित्त घटता है, मालिश से वात कम होता है और उल्टी करने से कफ कम होता है एवं उपवास करने से ज्वर शांत होता है।

पित्त प्रकृति वाले व्यकित के लक्षण

 पित्त प्रकृति वाले व्यकित के लक्षण

पित्त





















1.  शारीरिक गठन -   नाजुक शिथिल शरीर होता है इन्हें गर्मी सहन नहीं होती ।

2. वर्ण - पीला

3. त्वचा -  त्वचा पीली एवं नर्म होती है फुंसियों और तिलों से भरी हुर्इ, अंग शिथिल; हथेलियाँ, होठ, जीभ, कान आदि लाल रहते हैं ।

4. केश - बालों का छोटी उम्र में सफेद होना व झड़ना, रोम बहुत कम होना ।

5. नाखून - नाखून लाल

6. आंखें - लाल

7. जीभ - लाल

8. आवाज - स्पष्ट, श्रेष्ठ वक्ता

9. मुंह  -   कण्ठ सूखता है ।

वात,पित्त और काफ
10. स्वाद - मुंह का स्वाद कड़वा रहना, कभी-कभी खट्टा होना, मुंह व जीभ में छाले होना ।

11. भूख - भूख अधिक लगती है, बहुत सा भोजन करने वाला होता है, पाचन शक्ति अच्छी होती है ।

12. प्यास - प्यास अधिक लगती है ।

13. मल - मल का अधिक पतला व पीला होना, जलनयुक्त होना, दस्त की प्रवृत्ति ।

14. मूत्र - मूत्र कभी गहरा पीला होना, कभी लाल होना, मूत्र में जलन होना ।

15. पसीना - पसीना बहुत कम आना, गर्म और दुर्गन्धयुक्त पसीना ।

16. नींद - निद्रानाश 

17. स्वप्न - अग्नि, सोना, बिजली, तारा, सूर्य, चन्द्रमा आदि चमकीले पदार्थ देखना ।

18. चाल - साधारण किन्तु लक्ष्य की ओर अग्रसर चाल वाला होता है ।

19. पसन्द - गर्मी बुरी लगती है और अत्यधिक सताती है, गर्म प्रकृति वाली चीजें पसंद नहीं आती, धूप और आग पसंद नहीं, शीतल वस्तुयें यथा-ठंडा जल, बर्फ, ठण्डे जल से स्नान, फूलमाला आदि प्रिय लगते हैं, कसैले, चरपरे और मीठे पदार्थ प्रिय लगते हैं ।

20. नाड़ी की गति -  कूदती हुर्इ (मेढ़क या कौआ की चाल वाली), उत्तेजित व भारी नाड़ी होना ।

वात प्रकृति वाले व्यकित के लक्षण

वात प्रकृति वाले व्यकित के लक्षण




वात
















1.  शारीरिक गठन -   वात प्रकृति का शरीर प्राय: रूखा, फटा-कटा सा दुबला-पतला होता है, इन्हें सर्दी सहन नहीं होती।

2. वर्ण - अधिकतर काला रंग वाला होता है ।

3. त्वचा - त्वचा रूखी एवं ठण्डी होती है फटती बहुत है पैरों की बिवाइयां फटती हैं हथेलियाँ और होठ फटते हैं, उनमें चीरे आते हैं अंग सख्त व शरीर पर उभरी हुर्इ बहुत सी नसें होती हैं ।

4. केश - बाल रूखे, कड़े, छोटे और कम होना तथा दाढ़ी-मूंछ का रूखा और खुरदरा होना ।

5. नाखून - अंगुलियों के नाखूनों का रूखा और खुरदरा होना ।

6. आंखें - नेत्रों का रंग मैला ।

7. जीभ - मैली

8. आवाज - कर्कश व भारी, गंभीरता रहित स्वर, अधिक बोलता है ।

9. मुंह - मुंह सूखता है ।

10. स्वाद - मुंह का स्वाद फीका या खराब मालूम होना ।

वात,पित्त और काफ
11. भूख - भूख कभी ज्यादा कभी कम, पाचन क्रिया कभी ठीक रहती है तो कभी कब्ज हो जाती है, विषम अग्नि, वायु बहुत बनती है ।

12. प्यास - कभी कम, कभी ज्यादा ।

13. मल - रूखा, झाग मिला, टूटा हुआ, कम व सख्त, कब्ज की प्रवृत्ति ।

14. मूत्र - मूत्र का पतला जल के समान होना या गंदला होना, मूत्र में रूकावट की शिकायत होना ।

15. पसीना - कम व बिना गन्ध वाला पसीना ।

16. नींद - नींद कम आना, ज्यादा जम्हाइयां आना, सोते समय दांत किटकिटाने वाला ।

17. स्वप्न - आकाश में उड़ने के सपने देखना ।

18. चाल - तेज चलने वाला होता है ।

19. पसन्द - नापसन्द - सर्दी बुरी लगती है, शीतल वस्तुयें अप्रिय लगती हैं, गर्म वस्तुओं की इच्छा अधिक होती है मीठे, खटटे, नमकीन पदार्थ विशेष प्रिय लगते हैं ।

20. नाड़ी की गति -  टेढ़ी-मेढ़ी (सांप की चाल के समान) चाल वाली प्रतीत होती है, तेज और अनियमित नाड़ी ।