Sunday, 9 August 2015

अर्थ-व्यवस्था मे मंदी वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ.संस्थों की मुख्य भुमिका

 अर्थ-व्यवस्था मे मंदी वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ.संस्थों की मुख्य भुमिका

राजीव भाई


जिस समय यह वैश्वीकरण (ग्लोबलाईजेशन) और उदारीकरण (लिब्रलाईजेशन)
 शुरु हुआ था उस दिन से आज तक मैं और मेरे कई साथी पूरी बारीकी से इस पूरी प्रक्रिया को समझने का प्रयास कर रहे थे और ये हम समझना चाहते थे कि ये ग्लोबलाईजेशन है या और भी कुछ इसमें है । तो ये ग्लोबलाईजेशन शुरु हुआ तो इसके साथ बहुत सारे वायदे थे बड़ी-बड़ी बातें थीं, जो सबसे महत्वपूर्ण बात थी  वो आप शायद समझते होंगे उसको, या आपको स्मरण भी होगा कि 1990-91 में हमारे देश की अर्थ-व्यवस्था में थोड़ी सी मंदी आ गई थी तो उस रुकावट को दूर करना है तो सिवाय ग्लोबलाईजेशन या लिब्रलाईजेशन के इस देश के पास कोई अन्य मार्ग नहीं है, ऐसी बात पूरे देश में कही गई थी और मुझे बराबर स्मरण है कि हमारे देश के मूर्धन्य अर्थशास्त्री लोगों ने ये कहना शुरु कर दिया था कि "चूँकि देश के पास विदेशी मुद्रा का भण्डार बहुत कम रह गया है और हमारे पास बहुत कठिनाई से 3 सप्ताह तक इम्पोर्ट बिल चुकाने की मुद्रा है तो हमको तो कुछ करना ही पड़ेगा।" तो हमारे पास बैलेंस ऑफ प्राईसेस की क्राईसेस हो गई थी तो उस बैलेंस ऑफ प्राईसेस की क्राईसेस को दूर करने के लिये हमारी सरकार ने आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक के पास एप्रोच किया था लोन के लिये, पैसे के लिये, ऋण लेने के लिये, तो 1991 में जब आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक में भारत सरकार का पत्र गया कि भारत को शीघ्र ऋण चाहिये आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक से, तो  आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक की जैसी आदत है उन्होंने सबसे पहले ये कहना शुरु कर दिया कि आपको ऋण तो देंगे लेकिन उसके साथ हमारी कुछ शर्तें होंगी, तो आई.एम.एफ. की ओर से और वर्ल्ड बैंक की ओर से भारत सरकार को कुछ शर्तें पेश की गईं कि आप इन शर्तों को पूरा करें तो हम आपको कर्ज देने को तैयार हैं। तो वो शर्तें क्या थीं ?
वर्ल्ड बैंक और आई.एम.एफ. संस्थाओं की शर्तें क्या होती हैं?

सबसे पहली शर्त है आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक की, जब भी कोई देश कठिन परिस्थिति में जाता है तो उनका एक रटा-रटाया प्रिस्क्रिप्शन है कि सबसे पहले आप अपने देश की करेंसी का अवमूल्यन कीजिये तब हम आपको ऋण दे देंगे और इस बात को प्रस्तुत करने का तरीका अलग है, तो ये कहते हैं कि आप अपने मुद्रा का अवमूल्यन इसलिये करिये ताकि आपका निर्यात अधिक हो जाये और चूँकि आपका निर्यात अधिक होगा तो आप अधिक डॉलर्स कमायेंगे और आप अधिक डॉलर्स कमा सकेंगे तभी आप हमारे लिये हुये कर्ज को वापस कर सकेंगे। तो इसको यदि एक पँक्ति में कहूँ तो आई.एम.एफ. का एक प्रिस्क्रिप्शन है जो वो संसार के सभी देशों में लागू करवाती है कि आप एक्स्पोर्ट ओरिएंटेड डेवलपमेंट करना शुरु कीजिये, तो ये आई.एम.एफ. का पहला प्रिस्क्रिप्शन है । 

दूसरा उनका प्रिस्क्रिप्शन है कि आप जब एक्स्पोर्ट ओरिएंटेड डेवलपमेंट करना शुरु कर देंगे तो फिर एक काम और कर दीजिये अपने देश का दरवाजा खोल दीजिये कि आपके देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ आसानी से आ सकें और उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर जो आप पाबंदियाँ लगाते हैं जो रिस्ट्रिक्शन लगाते हैं उनको आप कम से कम कर दीजिये या इसे समाप्त कर दीजिये ताकि आपके बाजार में उनको व्यापार करने में कोई असुविधा ना हो, और क्यों आप अपने देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बुलाइये ? आप यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बुलायेंगे अपने बाजार में तो इसके साथ हाईटेक बहुत आयेगा तकनीक बहुत आयेगी और जब तकनीक बहुत आयेगी तो आपके यहाँ गुणवत्ता युक्त माल बनना शुरु हो जायेंगे तो आप निर्यात अधिक कर पायेंगे। तो बहुराष्ट्रीय भी आपके बाजार में आके आपका प्रमोशन करेंगे आपके निर्यात को बढ़ायेंगे। 

तीसरा प्रिसिक्रप्शन अक्सर उनका ये रहा करता है कि आप अपने इण्टरनल मार्केट (घरेलू बाजार) में जो घरेलू उधोग को संरक्षण देते हैं वो संरक्षण देना बंद करें और यदि आप संरक्षण देना बंद करेंगे तो उसके बारे में IMF का ये मानना है कि आप एक Conservative अर्थ-शास्त्र को चलाने का प्रयास कर रहे हैं। तो आप घरेलू उधोग को प्रोटेक्शन मत दीजिये, बहुराष्ट्रीय को खुली छूट दे दीजिये पूँजी लाने की भी खुली छूट दे दीजिये और पूँजी ले जाने की भी खुली छूट दे दीजिये उनके ऊपर किसी प्रकार की भी पाबंदी नहीं होनी चाहिये और आप सब के सब फ्री ट्रेड (मुक्त व्यापार) के लिये अपने आपको तैयार कर लीजिये फिर इसके बाद कुछ और बातें भी बताई जाती हैं जैसे एक बात ये बताई जाती है कि भारत की अर्थ-व्यवस्था Competetive नहीं है तो आप जब तक दरवाजा नहीं खोलेंगे तो तब तक आपके अर्थ-व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा नहीं आयेगी और आपके अर्थ-व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा नहीं होगी आपके देश के ग्राहक को उसकी बहुत हानि होगी। तो आपकी इकानमी में प्रतियोगिता होनी चाहिये ग्राहक को उसका लाभ होना चाहिये तो इसके लिये आवश्यक है कि आप अपने बाजार में या भारत के बाजार में आने की खुली छूट दें और ऐसे-ऐसे करके वो कुछ शर्ते बताते चले जाते हैं और संसार के बहुत सारे देश हैं जो उनको लागू करते चले जाते हैं। और एक बात मैं आपको और बता दूँ कि ये जो IMF, World Bank की जो शर्ते होती हैं वो शर्ते बस संसार के निर्धन देशों पर ही लागू होती हैं, एक सूचना मैं आपको ये दे दूँ कि अमेरिका और यूरोप के देश IMF से कर्ज लेते हैं और IMF और World Bank से कर्ज लेते हैं तो जो शर्ते वो हमारे ऊपर लगाते हैं वो शर्ते अमेरिका के ऊपर नहीं लगाई जाती, क्योंकि हमेशा से वो मानके चलते हैं कि अमेरिकन इकानमी पहले से ही भूमण्डलीये है यधपि ये सबसे बड़ा झूठ है कि अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था भूमण्डलीÏत है, दूसरा उनका ये मानना है कि अमेरिकन इकानमी में बहुत प्रतिस्पर्धा है ये उससे भी बड़ा झूठ है कि अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा है। तीसरी बात जो कहते हैं कि अमेरिकन पूरी तरह से फ्री इकानमी है ये संसार का सबसे बड़ा झूठ है कि अमेरिकन अर्थव्यवस्था फ्री अर्थ-व्यवस्था है और फिर यूरोप के बारे में भी कुछ इसी तरह की बातें होती हैं। तो मेरे मन में अक्सर ये प्रश्न उठता आया है कि जब World Bank से अमेरिका भी ऋण लेता है यूरोप भी ऋण लेता है तो उनके ऊपर भी शर्ते नहीं लगाई जाती ? 
वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ.संस्थों की शर्ते अमेरिका और अन्य यूरोपियन ब्लाक पर कभी लागु नहीं की जाती क्यों ?

हमारे जैसे देश जब उनसे ऋण जाते हैं तब उनके ऊपर तत्काल शर्ते लगा दी जाती हैं, तो एक बार मन में आया कि ये जो IMF और World Bank चलती हैं उसके बारे में हमें समझना चाहिये कि अमेरिकन और यूरोपियन ब्लाक के लिये वो कभी शर्ते नहीं लगाते जो संसार के दूसरी या तीसरी दुनिया के देशों पर वो लगाते हैं तो उसका इतिहास बिल्कुल स्पष्ट यह बताता है कि ये बना कैसे,World Bank  और IMF दरअसल द्वितीय विश्वयुध्द में यूरोप और अमरीकी अर्थ-व्यवस्था तबाह (नष्ट) हो गई थी यूरोप को कुछ अधिक हानि हुई थी अमेरिका को कुछ कम, तो यूरोप और अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था जो द्वितीय विश्वयुध्द में नष्ट हुई तो उस अर्थ-व्यवस्था को फिर से खड़ा करने के लिये दो इंस्टीटयूट का जन्म हुआ World Bank और IMF के नाम पर Brettenwood नाम की एक जगह है, अमेरिका में एक गाँव जैसा है अभी वो थोड़ा बड़ा नगर हो गया है वहाँ पर एक संधि हुई थी जिसमें 44 देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति शामिल हुये थे, उन लोगों ने एक संधि किया था जिसका नाम है 'Brettenwood संधि तो उस 'Brettenwood संधि के आधार पर World Bank और IMF का जन्म हुआ, द्वितीय विश्वयुध्द के बाद और जब से ये IMF और World Bank का जन्म हुआ है तब से वहाँ एक नीति चलती है, नीति ये चलती है कि IMF और World Bank में जो सदस्य देश हैं वो बिल्कुल लोकतांत्रिक नहीं हैं One Member One Vote कभी नहीं होता IMF में, और ना World Bank में होता है वहाँ अमेरिका के पास सबसे अधिक वोट हैं और अमेरिका का जो Voting share है IMF में और World Bank में भी वो करीब 20% है माने यदि अमेरिका यदि 1 वोट डालता है और उसकी जो कीमत है अगर कुल वोट की कीमत यदि 100 रुपया मानी जाये तो अमेरिका के वोट की कीमत 20 रुपये के बराबर होती है बाकी 80 रुपया की कीमत में दुनियो के सारे देश हैं और वो सारे देश की संख्या लगभग 117 है और IMF और World Bank में कभी भी लोकतंत्र आ नहीं पाया है और आने वाला भी नहीं है क्योंकि वो हमेशा से ढाँचा वैसा ही बनाकर रखना चाहते हैं। 
ये जो World Bank बना था वो इसलिये बना था ताकि दुनिया के तमाम देश युध्द के बाद द्वितीय विश्वयुध्द के बाद जब  कम अवधी ऋण (शार्ट टर्म लोन) की आवश्यकता पड़े तात्कालिक कोई पेमेण्ट की आवश्यकता पड़े तो बैलेंस आफ पेमेंट की क्राईसेस हो जाये तो IMF उसके लिये कर्ज बाँटेगा और किसी देश को यदि इंफ्रास्ट्रक्चर के डेवलपमेंट के लिये यदि लोन की आवश्यकता पड़े तो World Bank उसको बाँटेगा, तो इस तरह से बँटवारा हुआ था और उसमें एक महत्वपूर्ण बात है जो मुझे इन संस्थाओं का अध्ययन करने के बाद पता चली जो सामान्य लोगों को मालूम नहीं होती है IMF और World Bank जुड़वा कह सकते हैं एक दूसरे का, और इसमें होता क्या है कि यदि कोई देश World Bank से कर्जा लेने के लिये जाये तो World Bank की तरफ से यह कहा जाता है कि आप IMF की शर्तो को पूरा करिये, माने Cross conditionality की व्यवस्था चलती है और उसमें होता क्या है परोक्ष रूप से वो दोनो शर्ते वो लागू करवा देते हैं इन निर्धन देशों के ऊपर, और मैं कहना ये चाहता हूँ कि World Bank और IMF के तरफ से दी गई शर्ते या उसकी तरफ से दिये गये प्रिसिक्रप्शन कभी रिफार्म नहीं हो सकते ये रिफार्म शब्द का अपमान है ये World Bank और IMF बने ही हैं अमेरिकन और यूरोपियन ब्लाक की Hegemony को बनाये रखने के लिये।
 
भारतीयों से क्या गलती हुई?
हमारे यहाँ क्या त्रुटि हुई पिछले 7 वर्षो में हमारे यहाँ प्रेस ने विशेषकर अंग्रेजी प्रेस ने IMF और World Bank के प्रिसिक्रप्शन को रिफार्म के नाम पर प्रचारित करना शुरु कर दिया और IMF और World Bank की शर्तो को Globalization के रूप में प्रचार करना शुरु कर दिया। Globalization एक बहुत बड़ा व्यापक शब्द है और IMF और World Bank की शर्त बहुत छोटा शब्द है। तो हमसे जो त्रुटि हुई है पिछले 7 वर्षो में विशेषकर इस देश के Intellectual Class से सबसे बड़ी त्रुटि ये हुई कि IMF और World Bank की शर्तो को हमारे देश ने रिफार्म मानने की बड़ी भारी भूल की और IMF और World Bank की शर्तो को हमारे देश में New economy Policy के रूप में प्रचारित किया गया उसमें सरकार की हिस्सेदारी तो है ही, सरकार से अधिक इस देश में मीडिया की जिम्मेदारी थी। इन्हें इस देश के लोगों को साफ-साफ बताना चाहिये था कि इस देश में जो कुछ हो रहा है वो विश्व बैंक और IMF की शर्तो के कारण हो रहा है उसमें भारत सरकार अपनी इच्छा से शामिल है इस पर संदेह था।  

भारत अर्थव्यवस्था का ईतिहास

भारत अर्थव्यवस्था का ईतिहास

राजीव भाई

हमारे इस देश मे कोई आजादी आई नहीं ,यह देश आज भी उतना ही गुलाम है जितना कभी अंग्रेजो के समाने मे था, बल्की आज तो पहले से भी जादा हमारा देश गुलाम हैं । देश की व्यवस्थायें अंग्रेजो के जमाने से जादा गुलाम हैं । ब्रिटिश संसद मे १८१३ मे बहस चल रही है के भारत को गुलाम बनाने के लियें भारत की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करना हैं इसके लिये भारत के व्यापारीयोंओं को बर्बाद करना होगा । यदि भारत के व्यापारी बर्बाद हो जयेंगें तो ईस्ट ईन्डीया की कम्पनी का माल इस देश मे बिकने लगेगा । इस बहस मे एक अंग्रेज अधीकारी बीलव्र फोर्स क्या कहता हैं कि हमे भारत मे फ्री ट्रेड करना हैं । फ्री ट्रेड का मतलब "ब्रिटीश उत्पादो का भारत के गांव - गांव मे बिकना, ब्रिटीश उत्पादो का भारत के बाजार मे भर जाना और भारतवासीयों द्वारा जादा से जादा ब्रिटीश उत्पादो का उपभोग करना " और इसके दुसरे भाग में बीलव्र फोर्स कह रहा है कि "भारत मे बहुत अच्छा कंचा माल है जो सरा का सरा ब्रिटेन मे आयें जिस पर हमें एक पैसा भी खर्च ना करना पडे और उस माल को ब्रिटेन मे तैयार करके भारत के बाजारो मे बेचना और ब्रिटिश के माल पर कोई टेक्स नही लगेगा, यह हैं फ्री ट्रेड । यह फ्री ट्रेड आज भी भारत मे चलाया जा रहा हैं ग्लोबलीजेशन और लिब्रललीजेशन के नाम पर, जो १८१३ मे भी अंग्रेजो द्वारा चलाया गया था इस देश मे यहां की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने के लियें तो इसमे नया क्या हैं । तो १८१३में ईस्ट ईंन्डीया कम्पनी की सरकार फ्री ट्रेड के लियें अलग - अलग पोल्सियां बन रही है और वो पोल्सियां क्या है ? सब से पहली पोल्सी हैं कि ब्रिटिश माल पर कोई टेक्स नहीं लगेगा और भारतीये माल पर अधिक से अधिक टेक्स लगाया जाए । परिणाम क्या निकलेगा कि ब्रिटेन का माल सस्ता हो जाएगा और भारतीयें माल महंगा हो जायेंगा । ताकी ब्रेटेन का माल भारत के गांव -गांव मे बिके और भारत के व्यापारीयों का माल नही बिकेगा और भारत के व्यापारी बर्बाद हो जायेंगें । और भारत के व्यापारी बर्बाद हो गए तो भारत कि अर्थव्यवस्था भी बर्बाद हो जायेंगी । ब्रिटेन के माल पर को टेक्स नहीं और नाही कोई आयात टेक्स भी नहीं लगेगा । तो इस के लियें वह भारत में विभीन्न कानून बना रहे है इस देश में ताकी इस देश को बर्बाद किया जा सके । इसके लिये भारतवासीयों पर जो माल बना रहे है सबसे पहला टेक्स लगाया गया सेंट्राल एक्साईज एण्ड सोल्ट टेक्स ( वस्तूओ के उत्पादान पर टेक्स) जो भारत के लोग उत्पादन कर रहे है उस पर टेक्स लगाया । और वो लोग जब उन वस्तूओं को बाजार मे बेचने जाते है तो उसपर भी टेक्स (सेल्स टेक्स) और अब जो माल बैचने से जो आमनदनी हूई है उस पर भी टेक्स लगा दिया आयेकर ( ईन्काम टेक्स) । तथा वस्तूओं के लाने ले जाने पर भी एक टेक्स लगा दिया ऑक्ट्रोये टेक्स (चूंगी नाका टेक्स) तथा ईस्ट ईण्डीया कि कम्पनी भारत में कोई पुल बना देते थे तो उस पूल पर से कोई गाडी जायें तो उस पर भी टोल टेक्स। इस प्रकार के पांचो टेक्स अंग्रेज लगा रहे हैं ताकी भारतीयां व्यापारीयोंओं को बर्बाद कर सकें । और आप को यह जान कार अश्चर्यी होगा की यह पांचो के पांचों टेक्स आज भी इस देश मे ही चल रहे है । अंग्रेजों ने तो समझ मे आता हैं की भारत को बर्बाद करने के लियें यह टेक्स लगायें थे । कूल मिलाकर इन पांचो टेक्सों को देखें तो १०० रू कि वस्तू पर १२७ रु का टेक्स देना पड रहा था । अब भारतीयें व्यापारीओं का माल महंगा होगया और दुसरी तरफ ब्रिटीश माल पर सभी प्रकार के टेक्सों को हटा दिया गया ताकी ब्रिटीश माल सस्ता हो जायें और गांव - गांव मे उनका माल बिके । जब १०० रु की वस्तू पर १२७ रु देने पडे तो वह व्यापारी बर्बाद हो जाएगा मर जाएगा या तो वोह व्यापारी बईमान बन जायेंगा तो दोनो ही तरफ से लडू अंग्रेजो के हाथ मे है कयोकी व्यापारी बईमान बना तो , बईमान व्यक्ति कभी आंख मिलाकर बात नही कर सकता तो यो हमारा गुलाम बन जयेंगा या बर्बाद हो गाया तो भी वो हमारा गुलाम बन जायेंगा । तो व्यापारी किस प्रकार बर्बाद हुयें यह समझ मे आ गया होगा । अंग्रेजों ने इस देश मे टेक्सेशन का सीस्टाम क्यों लायें इस देश के व्यापारीओं को बईमान बनाने के लिए कि वो टेक्स कि चोरी करें या बर्बाद हो जाए । इस के लियें उन्होने अलग- अलग विभाग भी बनाए,सेंट्राल एक्साईज विभाग, सेल्स टेक्स विभाग, ईन्काम टेक्स विभाग,ऑक्ट्रोये टेक्स विभाग और टोल टेक्स विभाग । जो आज भी चल रहे हैं । आप ध्यान से सोचे कि अंग्रेज तो इस देश को बर्बाद करना चाहते थे इसलिए टेक्सेशन का सीस्टाम लयें परन्तू आज भी वही टेक्सेशन का सीस्टाम चल रहा है क्यों ? अंग्रेजों ने ईन्काम टेक्स लगाया तो कितना लगाया ९७% टेक्स । मतलब १०० रू पर ९७ रु टेक्स आप को केवल ३ रू ही मिलेंगें । और आप को यह जान कर अश्चर्यी होगा की देश आजाद हुआ १९४७ को और तब भी इस देश मे टेक्स ९७% ही लगता रहा १९७१-७२ तक क्यों ? परन्तू आजाद होने के बाद भी हमरी सरकार इन टेक्सो को क्यों लगा रही हैं ? बल्की आज तो और भी कई और नये टेक्स लगा दियें गयें हैं । यदि विदेशी देशो में एक से दो प्रकार के टेक्स ही लगायें जाते है जबकी भारत मे ६४ प्रकार के अप्रत्याक्ष वं एक परोक्ष टेक्स लगाए जाते है । मान लीजियें १०० रुपये के वस्तू पर कूल टेस्क को जोडा जाये तो ६५% तो टेक्स ही देना पड्ता है यानि १०० रु की वस्तू १६५ रु मे मिलेगी । डब्लू.टी.औ. कुल १२४ देशो में लागू है २००५ के राजीव भाई के व्याख्यां में बता रहें है एक देश हैं अमेरीका किस पर पछ्ले २० वर्षो से संसाद मे बहस चल रही हैं परन्त वह वैट टेक्स नहीं ला रहे आपने देश में और उनमें से १२३ देश एसे हैं जिनदेशों मे वैट टेक्स तो लागू हुआ परन्तू एक भी अप्रत्याक्ष टेक्स नहीं हैं इस देश में और हमारे देश मे १४ अप्रत्यक्ष टेक्स हैं और उस्में वैट १५वां टेक्स और आ गया हैं ब्राजील मे संसाद मे और संसाद के बाहर २० वर्षो तक बहस की लोगों ने व्यापरियों ने और सुझाव दियें सुके अनूसार वैट टेक्स आया और वैट टेक्स आने से पहले सारे के सारे अप्रत्यक्ष टेक्सों को समाप्त किया फिर वैट टेक्स आया और भारत में उस पर कोई बहस नही हूई उसे हस्ताक्षर करने से पहले और जिन मत्रीयों ने यह वैट लाया उन्हों ने भी इसे लाने से पहले नहीं पडा । जर्मनी मे भी १२-१५वर्षॉं तक बहस चली । मुख्य बात जो कहना चाहता हू वो यह कि सभी १२३ देशो मे जहॉ पर भी वैट टेक्स आया हैं वहॉ पर कोई भी अप्रत्यक्ष टेक्स नहीं हैं और उनमें से २३ देश तो एसे है जिनमें प्रत्यक्ष टेक्स भी नहीं हैं केवल एक ही टेक्स हैं वैट टेक्स । उदहारण के रुप में स्वीजार्लेण्ड में एक ही टेक्स हैं वैटे टेक्स वहॉ पर इनकम टेक्स भी नही सेल्स टेक्स भी नहीं कोई दुसरा टेक्स नहीं । और उदहारण दूं लग्ज्मबर्ग एक देश है, पनामा एक देश है एसे २३ देश हैं दुनियां में जिनमें वैट के अलावा कोई दुसरा टेक्स नहीं हैं ८४ देश एसे हैं दुनियां में जहॉ पर दो टेक्स हैं एक इनकम टेक्स और दुसरा वैट टेक्स हैं । अब भारत की बात करें । भारत में एक प्रत्यक्ष टेक्स हैं और १४ अप्रत्यक्ष टेक्स हैं और उपर से वैट टेक्स भी क्यों ? जिदेशो में प्रत्यक्ष टेक्स और अप्रत्यक्ष टेक्स दोनो समाप्त हो गयें और केवल एक ही टेक्स रह गया तो उनके तो मजे हो गए परन्तू भारत में ? अब आपको पता चले की जिन देशो में इन सारे टेक्सों को हटा कर वैट टेक्स लाया उस वैट टेक्स की दर भारत के वैट टेक्स की तुलना मे कम हैं तो ? और वहॉ पर वैट टेक्स भी सभी वसतूओं पर नहीं है । और एक बात बडी महत्व की हैं सभी वैट टेक्स वाले देशो में एक कानून हैं "क्सटोडीयान कानून" इस मतलब सरकार टेक्स की मालीक नहीं हैं वह केवल क्सटोडीयान हैं उस टेक्स के पैसे को देश के विकास में लागा सकती हैं या सम्भाल के रख सकती हैं इसका मतलाब उस पैसे की मालीक नहीं हैं मालीक तो टेक्स भरने वाला हैं जब उसे पैसे की अवश्यकता हो तो सरकार को सारा पैसा अपको देगीं । मान लिजियें कि यदि आप जर्मन मे रह रहें हैं और आपने २१ वर्षो तक वैट टेक्स भरा और उसके बाद आप उस देश को छोड कर दुसरे देश हमेशा के लियें जाना चाहते हैं तो सरकार आप की टेक्स एक -एक पैसा आप को उसी दिन आप को देगी और आपको एक धन्यावाद पत्र भी देगी । इस प्रकार का नियम है सभी देशो मे जहॉ पर भी वैट टेक्स लिया जाता है भारत को छोड कर । और एक बात यदि कोई भूक्कांप आ गया या बाड आगई तो आप का सब दूकान मकांन बर्बाद हो गया तो भी सरकार आप का सारा टेक्स आप को देगी और अगले तीन वर्षो तक आप से कोई टेक्स नही लेगी । भारत मे एसा कोई नियम नहीं हैं और एसी सम्भावना भी नहीं हैं भारत को छोड कर सभी देशो वैट वाले देशो में यह नियम है सिन्गल पोईन्ट वैट हैं और भारत मे मलटी पोईन्ट वैट है (मतलब एक वस्तू पर एक ही बार वैट टेक्स लगेगा ) और नियम है वैट टेक्स सेन्ट्रालाईज केन्द्र सरकार द्वारा है जबकी भारत में वैट टेक्स राज्य स्तर पर लगता है तो अलग राज्य तो मे अलग नियम तो बहुत समस्या होती है वैट को लेकर यदि वस्तू एक राज्य से दुसरे राज्य में जायें तो । एक और नियम हैं  वैट टेक्स कि दर बहूत कम हैं भारत कि तूलना में । और एक बात जो टेक्स अधीकारी होता हैं  उसे कोई जूडीशीयल अधीकार नही होता हैं (मतलब आपको जेल भेजने का अधिकार या आपकी सम्पति को जब्त करके उसकी निलामी करने का अधिकार एसा कोई भी अधिकार टेक्स के किसी भी अधिकारी को नही हैं ।) भारत मे एक और वैट टेक्स मे डाला गया हैं की सभी अंतराष्ट्रीयां संस्था प्रोफीटेव्ल और नोन प्रोफीटेव्ल पर कोई वैट टेक्स नहीं लगेगा । इसका मतलब सभी चर्च अब टेक्स से बहार होंगें और सभी मंदिरों पर अब टेक्स लगेगां क्यों ?हमारे देश मे शराब पर वैट टेक्स नहीं है और लाट्रीओं पर टेक्स नहीं हैं परन्तू दूध पर वैट टेक्स हैं नमक पर वैट टेक्स हैं  मतलब सरकार चाहती हैं की हम शराब पियें दूध को छोड कर । मैं कैसे यह मानू की यह देश अजाद हो गया हैं ।


अंग्रेजों की संसाद में एक बहस चल रही है कि भारत का कुल व्यापार कितना है ? तो इस का जवाब विलीयम एडम भारत के कई रेवेनू के अधिकारियों कि मद्द से सर्वे करने के बाद देता है कि भारत का कुल व्यापार १८३५-५० तक १/३ प्रतिशत था , या दुसरी तरह से कहें के  सारी दुनियां का कुल ट्रेड मान लिजियें की १०० बिलीयान डालार हो तो उस समय केवल भारत का ट्रेड ३३बिलीयान डालार था या तीसरी तरह से कहें तो भारत का कुल निर्यात दुनियां के कुल निर्यात का ३३% था । जब्कि उस समय भारत में कोई बडा प्रोजेक्ट नहीं था और ना ही इतने ईन्वेश्मेंटर थे । वो भी तब जब अंग्रेज भारत को बर्बाद करने पर तुले हूए थे ।  आज क्या स्तिति है ? आज भारत का कुल उत्पाद दुनिया  के कुल उत्पाद का ०.०१ प्रतिशत हैं । तो हम विकास कर रहे है या विनाश की और बड रहे हैं जरा सोचीयें ।


तो जरा सोचो के भारत पर जब कोई टेक्स नही लगा था तब तक भारत ३३% का उत्पादन करता था और आज भारतीयों पर टेक्स लगा -लगा कर बर्बाद कर दिया है आजादी के बाद भी हमारा खुन चूसा जा रहा हैं टेक्सो के द्वारा हमे आज भी बईमान बनाया जा रहा है ताकि हम गलत बात का विरोध ना कर सकें और वो अपनी मन्शाओं को पुरा करते रहें । 


विलीयम एडम के सर्वे के अनुसार १८३५-५० तक भारत में स्टील बनाने वाली १०००० फेक्ट्रीयां थी ।  भारत कि उन १०००० स्टील की फेक्ट्रीयांओं से कुल स्टील का उत्पादन ८० से ९० लाख टंन होता था सन १८३५-५० तक और आज भारत में इतने बडे - बडे स्टील पलान्ट, इतनी मशीनें , इतने विदेशी कम्पनियां और इतने सारे स्टील के फेक्ट्रीयां परन्तू कुल उत्पादन ७० से ७५ लाख टंन प्रति वर्ष था । उनमे जो स्टील बन रहा था उसकी गुणवता (कूवालीटी ) क्या थी ?  उस पर वर्षो -वर्ष जंग नहीं लगता था इतना बडीयां गुण्वत्ता का स्टील भारत में बनता रहा १८३५-५० तक । जिसका जीवांत उदाहरण हैं मेहरोली में लोहे का अशोक स्तम्भ । और आज का स्टील यदि वर्षा के पानी में छोड दें तो ३ महीने में ही लोहे पर जंग लग जायेंगा । और यह स्टील कि सबसे अधिक फेक्ट्रीयां सर्गूजा मध्य प्रदेश मे है क्यों की दूनियां का सबसे अच्छा आईरन ऑर सबसे अधिक मात्रा में भारत के सर्गूजा में पाया जाता हैं, और जो इस तकनिक को जानते है उन्हे हम आदिवासी कहते हैं उन के पास कोई डीग्री नहीं है परन्तू वह सबसे अच्छा स्टील बनाने की कला जानते हैं परन्तू हम मनते हैं कि जिसके पास कोई डीग्री नहीं हैं वो अशिक्षीत हैं ,मुर्ख हैं । जबकी उनके पास सबसे उत्तम तकनीक हैं जो आज धीरे -धीरे   लूप्त होती जा रही है हमरी गलती के कारण । अंग्रेजों ने इस कला को बर्बाद करने के लिये भी एक कानून ( ईण्डीयन फोरेस्ट एक्ट)  बनाया था जिसके अनूसार स्थानीयें आदीवासीओं को लोहे से अच्छी स्टील बनाना जानते थे उन्हे खादानो से कंचा माल नही लेने देते थे । यदि वह खदानों से कचा माल लें तो उनको ४० कोडे मारे जाते थे और उस पर भी यदि वह व्यक्ति नहीं मरे तो उसको गोली मार दी जाती थी इसना सख्त कानून बना दिया ।  तो बीना कचां माल के वह लोग भूखे मरने लगे । और उन्हीं  खदानों से अंग्रेज लोहा खोद - खोद कर ले जाते थे । और स्टील की विभिन्न वस्तूएं बनाकर हमरे बाजारो में बेचा करते थे । आज भी वोही कानून( ईण्डीयन फोरेस्ट एक्ट) चल रहा है भारत के मूल निवासी (आदिवासी) लोहा नही ले जा सकते । जबकी जापान कि काम्पनी निपन्डेरनू  (एसी ही और भी विदेशी कम्पनियां) । आज भी कचा माल कोडीयों केदाम खोद - खोद कर ले जा रही है और स्टील बनाकर हमे ही उंच्चे दामॉ पर बेच रही हैं ।  आज भी सर्गुजा मे कुछ आदिवासी लोग हैं जो उस तकनीक को जानते है परन्तू उनको आज भी उसी कानून के कारण स्टील नही लेने दिया जाता । तो हम कैसे अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारे जब हमे ही हमारा कचां माल नही लेने दिया जाता और विदेशी कम्पनियों को कोडीयों के दाम पर कचां माल खोद-खोद करे लें जा रही हैं । और क्यों कोई राजनितिक पार्टी , भारत देश के लोग इस पर विचार नही मरते । क्यों नहीं इस कानून को रद्द किया जाता हैं । कैसे में मानू के यह देश आजाद हो गया ?
अशोक स्तम्भ
भारत में बहुत अच्छा कपडा बनाने वाले बडीयां कारीगर होते था वो कपडा इतना बारीक बुनाई करते थे की कोई मशीन भी नहीं कर सकती । उस कपडे के थान के थान एक छोटी सी अंगूठी में से निकल जाते थे । पूरी दुनियां मे प्रसिध्द था भारत का कपडा १८३५-५० तक । भारत मे उस समय तक दो ही वस्तूएं सबसे जादा निर्यात होती थी कपडा और मसाले । अंग्रेजो का कपडा लंका शयर और मान्चेस्ट्र का कपडा बिक नही पाता था क्योंकी भारत का ही कपडा इतना बडीयां होता था । तो फ्री ट्रेड के नाम पर अंग्रेजों ने उन सब करीगरों के अंगूठें और हाथ कटवा दियें  । सुरत में १००००० बहतरीन कारीगरों के अंगूठें और हाथ कटवा दियें । बिहार मे एक इलाका हैं मधूबनी । मधूबनी मे २५०००० से ३००००० कारीगरों के हाथ कटवा दियें अंग्रेजों ने । इस पर अंग्रेज बडा गर्व करते है, कयोकी भारत का सबसे बडा उद्योग हैं कपडा मील्ले और कारीगर नही रहेंगे तो कपडा मील्ले नही चल सकती और जब कपडा मील्ले धराशाही होगी तो भारत की अर्थव्यवस्था भी धराशाही हो जाएगी । यह एक वार्ता हैं ब्रिटीश की संसाद मे चल रही हैं । और उसके बाद अंग्रेजों ने यह कर दिया हैं  ताकी अंग्रेजो का माल (लंका शयर और मान्चेस्ट्र का कपडा ) भारत मे बिक पायें । और अंग्रेजों ने अपने कपडों पर से सारे टेक्स हटा लियें और भारत की कपडा मील्लों पर अतीरीक्त टेक्स लगाया । सुरत की कपडा मील्लों पर १०००% अतीरिक्त टेक्स लगा दिया । 
ताकी यह उद्योग बन्द हो जायें । और लंका शयर और मान्चेस्ट्र का कपडा  बिकने लगे ।

अब कपडा बनाने के लियें कच्चा माल अंग्रेजों को चाहीयें तो भारत का कोटन ब्रिटेन मे जाने लगा । तो अंग्रेजों को बडा परीशाम करना पडता था तो अंग्रेजों ने जहां - जहा पर अच्छे कोटन (कच्चा माल) मिलता था वहां - वहां पर अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ के लियें रेलगाडी चलाई इस देश में । आपको लगता होगा कि अंग्रेज नही आते तो रेलगाडी नही होती इस देश में परन्तू आप यह नही जानते की अंग्रेजो ने रेल इस लियें चलाई ताकी अंग्रेजे भारत के गांव - गांव से कोटन को ईकाठा करके मुम्बाई ले जा सके और मुम्बाई के बन्द्रगाह से जहाजॐ के द्वारा कोटन को ब्रिटेन ले जा सके । और बाद में इसी रेल  का एक और प्रयोग होने लगा । अंदोलन को कुचलने के लियें जल्दी से जल्दी भारत के विभिन्न क्षेत्रो मे सेना को पहुंचाने के लिए रेल का प्रयोग भी किया जाने लगा ।  अंग्रेजों के सबसे पहले रेल जो चलाई है मुम्बाई से थाना के बीच में ट्राईल के रुप में । जब बाद मे प्रयोग सफल हो गया तो सबसे पहले अंग्रेजों ने रेल चलाई है मुम्बाई से अहमदाबाद मे बीच में जो कपास के लिये सबसे अच्छा उत्पादान करते हैं ।  अब अंग्रेजों के कपास को ईकाठा कर के मुम्बाई के बंद्र्गाह से कपास के जहाज तो भर कर भेजना शुरु कर दियें परन्तू इंग्लेंड से खाली जहाज आते थे तो खाली जहाज समून्द्र में डुब जाते थे । तो इसके लियें उन्हो ने समून्द्री जहाजों में नमक भर कर भेजना शुरु कर दिया । समून्द्री जहाजों में नमक भर कर ईंग्लेंड से आते थे और मुम्बाई के बन्द्रगाह पर नमक डाल देते थे । और यहां से कपास भर कर ले जाते थे । भारत में उस समय तक सभी लोग स्वादेशी नमक ही खाते थे । परन्तू अग्रेजों ने स्वदेशी नमक पर भी टेक्स लगा दियें और अपना नमक टेक्स फ्री बेचने लगें ताकी सभी उनका नमक खाएं । इस पर महात्मा गांधी जी ने डांडी सत्यग्रह किया । ६ अप्रेल १९३० में महात्मा गांघी जी ने एक मूठ्ठी हाथ मे लेकर कसम खाई थी के भारत में विदेशी नमक नहीं बिकने दूंगा । और आज भारत में कितने ही विदेशी नमक बिक रहे हैं पत्ता नहीं गांघी जी कि आत्मा को कितना दुःख होता होगा यह देख कर । हमारी सरकारो ने विदेशी कम्पनियों को नमक बनाने के लियें भी अनूमती दे दी । जरा आप बातायें कि नमक बनाने मे कॉन सी हाईटेक तकनीक हैं । समून्द्र का पानी एक जगह ईकाठा कर लेते हैं और धूप में  पानी भाप बन कर ऊड जाता हैं और नमक नीचे रह जाता हैं क्या भारत के लोग इतना भी नहीं कर सकते हैं । कि विदेशी कम्पनियाओं को नमक बनाने के लिये अनूमती दे दी । गांधीजी कि आत्मा कितने आंसू बाहाती होगी यह देख कर कि जिस देश मे मेने नमक सत्यग्रह किया वहां पर आजादी के बाद भी आज तक विदेशी नमक बिक रहा हैं जरा सोचीयें कि यह कितना बडा नेशनल क्राईम हैं । अंग्रेजों ने जो - जो व्यवस्थायें बनाई सभी इस देश मे आज भी चल रही हैं । तो मैं यह कैसे मानू की यह देश आजाद हो चूका हैं ।

Sunday, 2 August 2015

किसान स्वंय खाद घर में बना सकता है कम से कम खर्च में

 किसान स्वंय खाद घर में बना सकता है कम से कम खर्च में


खादखाद बनाने कि विधि ।

एक सरल सूत्र बताता हूँ जिसको भारत में पिछले 12-15 वषों में हजारो किसानों ने अपनाया है और बहुत लाभ उनको हुआ है। एक एकड़ खेत के लिए किसी भी फसल के लिए खाद बानाने कि विधि ।

1)  एक बार में 15 किलो गोबर लगता है और ये गोबर किसी भी देसी गौमाता या देसी बैल का ही होना चाहियें।  विदेशी या जर्सी गायें का नहीं होना चाहियें ।

2)  इसमें मिलायें 15 लीटर मूत्र, उसी जानवर का जिसका गोबर लिया है । दोनों मिला लीजिए प्लास्टिक के एक ड्रम में रख दें ।

3)  फिर इसमें एक किलो गुड़ डाल दीजिए और गुड़ ऐसा डाल दीजिए जो गुड़ हम नहीं खा सकते, जानवरी नहीं खा सकते, जो बेकार हो गया हो, वो गुड़ खाद बनाने में सबसे अच्छा काम में आता है। तो एक किलो गुड 15 किलो गोमूत्र, 15 किलो गोबर इसमें डालिए ।

4) फिर एक किलो किसी भी दाल का आटा (बेसन) ।


5) अंत में एक किलो मिट्टी किसी भी पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे से उठाकर इसमें डालना ।

ये पाँच वस्तुओं को एक प्लास्टिक के ड्रम में मिला देना, डंडे से या हाथ से मिलाने के बाद इसको 15 दिनों तक छावं मे  रखना । पन्द्रह दिनों तक इसका सुबह शाम डंडे से घुमाते रहना। पन्द्रह दिनों में ये खाद बनकर तैयार हो जाएगा । फिर इस खाद में लगभग 150 से 200 लीटर पानी मिलाना । पानी मिलाकर अब जो घोल तैयार होगा, ये एक एकड़ के लिए पर्याप्त खाद है। अगर दो एकड़ के लिए पर्याप्त खाद है तो सभी मात्राओं को दो गुणा कर दीजिए।  


अब इसको खेत में कैसे डालना है ?

अगर खेत खाली है तो इसको सीधे स्प्रै कर सकते हैं मिट्टी को भिगाने के हिसाब से। डब्बे में भर-भर के छिड़क सकते हैं या स्प्रै पम्प में भरकर छिड़क सकते हैं, स्प्रै पम्प का नोजर निकाल देंगे तो ये छिड़कना आसान होगा । 
फसल अगर खेत में खड़ी हुई है तो फसल में जब पानी लगाएंगे तो पानी के साथ इसको मिला देना है। 

खेत मे यह खाद कब-कब डालनी है ?

इसका आप हर 21 दिन में दोबारा से डाल सकते हैं आज आपने डाला तो दोबारा 21 दिन बाद डाल सकते हैं, फिर 21 दिन बाद डाल सकते हैं। मतलब इसका है कि अगर फसल तीन महीने की है तो कम से कम चार-पांच बार डाल दीजिए। चार महीने की है तो पांच से छह बार डाल दीजिए। 6 महीने की फसल है तो सात-आठ बार डाल दीजिए, साल की फसल है तो उसमें आप इसको 14-15 बार डाल दीजिए। हर 21 दिन में डालते जानला है। इस खाद से आप किसी भी फसल को भरपूर उत्पादन ले सकते हैं - गेहूँ, धन, चना, गन्ना, मूंगफली, सब्जी सब तरह की फसलों में ये डालकर देख गया है। इसके बहुत अच्छे और बहुत अदभुत परिणाम हैं। 
सबसे अच्छा परिणाम क्या आता है इसका? आपकी जिंदगी का खाद का जो खर्चा है 60 प्रतिशत, वो एक झटके में खत्म हो गया। फिर दूसरा खर्चा क्या खत्म होता हैं जब आप ये गोबर-गोमूत्र का खाद डालेंगे तो खेत में विष कम हो जाएगा, तो जन्तुनाशक डालना और कम हो जाएगा, कीटनाशक डालना ओर कम हो जाएगा। यूरिया, डी.ए.पी. का असर जैसे-जैसे मिट्टी से कम हो जाएगा, बाहर से आने वाले कीट और जंतु भी आपके खेत में कम होते जाएंगें, तो जंतुनाशक और कीटनाशक डालने का खर्च भी कम होता जाएगा, और लगातार तीन-चार साल ये खाद बनाकर आपने डाल दिया तो लगभग तय मानिए आपके खेत में कोर्इ भी जहरीला कीट और जंतु आएगा नहीं, तो उसको मारने के लिए किसी भी दवा की जरूरत नहीं पड़ेगी तो 20 प्रतिशत जो कीटनाशक का खर्चा था वो भी बच जाएगा। खेती का 80 प्रतिशत खर्चा आपका बच जाएगा। दूसरी बात इस खाद के बारे में ये कि ये सभी फसलों के लिए है। जानवरों का गोबर और गोमूत्र गाँव में आसानी से मिल जाता है। गोबर इकटठा करना तो बहुत आसान है। जानवरों का मूत्र इकटठा करना भी आसान है। 

देसी गौमाता या देसी बैल का मूत्र कैसे इकटठा करें ?

सभी देसी गौमाता या देसी बैल का मूत्र देते हैं। आप ऐसा करिए कि उनको बांधने का जो स्थान है वो थोड़ा पक्का बना दीजिए, सीमेंट या पत्थर लगा दीजिए और उस स्थान को थोड़ा ढाल दे दीजिए और फिर उसमें एक नाली बना दीजिए और बीच में एक खडडा डाल दीजिए। तो जानवर जो भी मूत्र करेंगे वो सब नाली से आकर खडडे में इकटठा हो जाएगा। अब देसी गौमाता या देसी बैल के मूत्र की एक विशेषता है कि इसकी कोर्इ एक्सपायरी डेट नहीं है। 3 महीने, एक साल, दो साल, पांच साल, दस साल कितने भी दिन पड़ा रहे खडडे में, वो खराब बिल्कुल नहीं होता। इसलिए बिल्कुल निशचिंत तरीके से आप इसका इस्तेमाल करें, मन में हिचक मत लायें कि ये पुराना है या नया। हमने तो ये पाया है कि जितना देसी गौमाता या देसी बैल का मूत्र पुराना होता जाता है उसकी गुन्वत्ता उतनी ही अच्छी होती जाती है। ये जितने भी मल्टीनेशनल कम्पनियों के जंतुनाशक हैं उन सबकी एक्सपायरी डेट है और उसके बाद भी कीड़े मरते नहीं है और किसान उसको कर्इ बार चख कर देखते हैं कि कहीं नकली तो नहीं है, तो किसान मर जाते हैं, कीड़े नहीं मरते हैं तो मल्टीनेशनल कम्पनियों के कीटनाशक लेने से अच्छा है देसी गौमाता या देसी बैल के मूत्र का उपयोग करना। तो इसको खाद में इस्तेमाल करिए, ये एक तरीका है। लगातार तीन-साल इस्तेमाल करने पर आपके खेत की मिट्टी को एकदम पवित्र और शुदध बना देगा, मिट्टी में एक कण भी जहर का नहीं बचेगा। और उत्पादन भी पहले से अधिक होगा । फसल का उत्पादन पहले साल कुछ कम होगा परन्तु खाद का खर्चा एक हि जाटके मे कम हो जायेंगा और उत्पादन भी हर साल बडता जायेगा ।

बीज संस्कार करने के लिए छोटा सा सूत्र

बीज संस्कार करने के लिए छोटा सा सूत्र

बीजबीज संस्कार करने के लिए छोटा सा सूत्र क्या हैं ?

तीसरी जानकारी आपको देना चाहता हूँ कि अच्छी फसल लेने के लिए जो बीज आप खेत में डालते हैं, उस बीज को आप पहले संस्कारित करिए, फिर मिट्टी में डालिए। बीज संस्कार करने के लिए छोटा सा सूत्र बताना चाहता हूँ।

मान लीजिए आपको गेहूँ का बीज लगाना हैं। तो बीज ले लीजिए एक किलो। एक किलो बीज के अनुसार में ये सूत्र बता रहा हूँ। अगर बीज दो किलो है तो सबको दुगुना कर लीजिएगा। 

एक किलो किसी भी देसी गौमाता या देसी बैल का गोबर ले लीजिए और उसी देसी गौमाता या देसी बैल का एक किलो मूत्र ले लीजिए। गोबर और मूत्र को आपस में मिला दीजिए। फिर इसमें 100 ग्राम कलर्इ चूना मिलाना है, कलर्इ चूना। चूने का पत्थर बाजार में मिल जाता है आसानी से। उस चूने के पत्थर को एक दिन पहले पानी में डाल दीजिए 2-3 लीटर पानी में। रातभर में को पानी गरम हो जाएगा, फिर वो चूना शांत हो के नीचे बैठ जाएगा। फिर इसको घोल लीजिए। फिर इस 2-3 लीटर चूने वाले पानी को गोबर और गोमूत्र वाले पात्र या बर्तन में डाल दीजिए। तो गोबर-गोमूत्र और सौ ग्राम चूने में जितना घोल तैयार होगा उसमें अच्छे से बीज को डाल दीजिए। कोर्इ भी बीज एक किलो इसमें आराम से भींग जाता है। बीज को इसमें 2-3 घंटे डालकर रखिए। रात में डाल दीजिए, सुबह से निकाल लीजिए। निकालकर इस बीज को छाँव में सूखा दीजिए और छाँव में सूखाने के बाद आप इसको खेत की मिट्टी में लगा दीजिए। तो जो ये बीज लगेगा मिट्टी में, ये संस्कारित हो गया। 

इस संस्कारित बीज से क्या फायदे होगा ?

इस संस्कारित बीज के दो फायदे हैं। एक तो फसल पर जल्दी कोर्इ कीट-कीड़ा नहीं लगेगा। तो कीटनाशक-जंतुनाशक से आपको मुक्ति मिल गर्इ, दुसरा फसल का उत्पादन भी अच्छा हो गया। तो बीज संस्कारित करने का एक सूत्र है, कीटनाशक बनाने का एक सूत्र है और खाद बनाने का एक सूत्र हैं, इन तीन बताए गए सूत्रों का भरपूर आप प्रयोग अपने खेत में करिए और अपने किसान मित्रों को ज्यादा से ज्यादा बताइए। मेरा आपसे एक छोटा सा निवेदन है कि इस वर्ष अपने खेत के एक एकड़ में से करके देखिए और एक एकड़ में आपने अगर ये करके देखा तो इसका परिणाम अच्छा आया तो अगले वर्ष पूरे खेत में करिए। और ज्यादा अच्छा आया तो पूरे गाँव के खेत में कराइए, फिर पूरे जिले के खेतों में करा दीजिए। गाँव-गाँव जाकर आप ये गोबर -गोमूत्र का सूत्र किसानों को सिखाना शुरू कर दीजिए, उसी तरह जैसे योग और प्राणायाम सिखाते हैं आप गाँव-गाँव जाकर। तो योग और प्राणायाम से शरीर दुरूस्त हो जाएगा और गोबर-गोमूत्र की खाद से उनका खेत अच्छा हो जाएगा। उनकी मिट्टी  अच्छी हो जाएगी, तो सोने पे सुहागे की सिथति बन जाएगी। इधर शरीर स्वस्थ हुआ, उधर मिट्टी स्वस्थ हुर्इ और उसमें से पैदा हुआ अनाज स्वस्थ मिला, उसमें से सबिजयाँ, घास-चारा स्वस्थ मिला। घास चारा जानवर खाएंगें तो दूध बढ़ेगा और उनकी बिमारियाँ कम होगी। हम स्वस्थ भोजन खाएंगे तो हमारी बिमारियाँ कम होगी और डाक्टर का खर्च बचेगां तो सारी जड़मूल से व्यवस्था का परिवर्तन शुरू हो जाएगा, और मेरा ये मानना है कि एक गाँव में अगर एक किसान भार्इ ने भी यदि ये कर लिया तो एक साल के अन्दर पूरा गाँव इसको कर लेगा ।

जैविक कीटनाशक दवाएं किसानों घर में खुद बना सकें वो भी कम से कम

जैविक कीटनाशक दवाएं किसानों घर में खुद बना सकें वो भी कम से कम खर्च में

कीटनाशककिसी प्रकार से हम कीटनाशक भी खुद तैयार कर सकते क्या हैं ?

बाजार से किसी विदेशी कम्पनी का 15000 रूपए लीटर का कीटनाशक लाने से अच्छा है इन देसी गौमाता या देसी बैले के मूत्र से ही कीटनाशक बना सकते हैं । अगर किसी फसल में कोर्इ कीट या जंतु लग गया, उसको खत्म करना है, मारना है तो उसके लिए एक सूत्र आप लिख लीजिए कि कीटनाशक बनाना भी बेहद आसान है, कोर्इ भी किसान भार्इ अपने घर में बना सकते हैं ।

कीटनाशक बनाने के लिए क्या करना पड़ता है ? 

एक एकड़ खेत के लिए अगर कीटनाशक तैयार करना है तो ः- 
1)     20 लीटर किसी भी देसी गौमाता या देसी बैले का मूत्र चाहिए।
2  20 लीटर मूत्र में लगभग ढार्इ किलो ( आधा किलो कम या ज्यादा हो सकता है ) नीम की पत्ती को पीसकर उसकी चटनी मिलाइए, 20 लीटर मूत्र में। नीम के पत्ते से भी अच्छा होता है नीम की निम्बोली की चटनी ।
3)   इसी तरह से एक दूसरा पत्ता होता है धतूरे का पत्ता। लगभग ढार्इ किलो धतूरे के पत्ते की चटनी मिलाइए उसमें। 
4)   एक पेड़ होता है जिसको आक या आँकड़ा कहते हैं, अर्कमदार कहते हैं आयुर्वेद में। इसके भी पत्ते लगभग ढार्इ किलो लेकर इसकी चटनी बनाकर मिलाए। 
5)   जिसको बेलपत्री कहते हैं, जिसके पत्र आप शंकर भगवान के उपर चढ़ाते हैं । बेलपत्री या विल्वपत्रा के पते की ढार्इ किलो की चटनी मिलाए उसमें। 
6    फिर सीताफल या शरीफा के ढार्इ किलो पतो की चटनी मिलाए उसमें। 
7)    आधा किलो से 750 ग्राम तक तम्बाकू का पाऊडर और डाल देना।
8)    इसमें किलो लाल मिर्च का पाऊडर भी डाल दें । 
9)       इसमे बेशर्म के पत्ते भी ढार्इ किलो डाल दें 

तो ये पांच-छह तरह के पेड़ों के पत्ते आप ले लो ढार्इ- ढार्इ किलो। इनको पीसकर 20 लीटर देसी गौमाता या देसी बैले मूत्र में डालकर उबालना हैं, और इसमें उबालते समय आधा किलो से 750 ग्राम तक तम्बाकू का पाऊडर और डाल देना। ये डालकर उबाल लेना हैं उबालकर इसको ठंडा कर लेना है और ठंडा करके छानकर आप इसको बोतलों में भर ले रख लीजिए। ये कभी भी खराब नहीं होता। ये कीटनाशक तैयार हो गया। अब इसको डालना कैसे है? जितना कीटनाशक लेंगे उसका 20 गुना पानी मिलाएं। अगर एक लीटर कीटनाशक लिया तो 20 लीटर पानी, 10 लीटर कीटनाशक लिया तो 200 लीटर पानी, जितना कीटनाशक आपका तैयार हो, उसका अंदाजा लगा लीजिए आप, उसका 20 गुना पानी मिला दीजिए। पानी मिलकर उसको आप खेत में छिड़क सकते हैं किसी भी फसल पर। इसको छिड़कने का परिणाम ये है कि दो से तीन दिन के अंदर जिस फसल पर आपने स्प्रै किया, उस पर कीट और जंतु आपको दिखार्इ नहीं देगें, कीड़े और जंतु सब पूरी तरह से दो-तीन दिन में ही खत्म हो जाते हैं, समाप्त हो जाते हैं। इतना प्रभावशाली ये कीटनाशक बनकर तैयार होता है। ये बड़ी-बड़ी विदेशी कम्पनियों के कीटनाशक से सैकड़ों गुणा ज्यादा ताकतवर है और एकदम फोकट का है, बनाने में कोर्इ खर्चा नहीं । देसी गौमाता या देसी बैले का मूत्र मुफ्त में मिल जाता है, नीम के पत्ते, निम्बोली, आक के पत्ते, आडू के पत्ते- सब तरह के पत्ते मुफ्त में हर गाँव में उपलब्ध हैं। तो ये आप कीटनाशक के रूप में, जंतुनाशक के रूप में आप इस्तेमाल करें ।

गौशाला और पंचगव्य उत्पादों के प्रयोग

गौशाला और पंचगव्य उत्पादों के प्रयोग

गौशाला

गौशाला और पंचगव्य उत्पादों के प्रयोग 

 गाय का विषय राजीव भाई का प्रिय विषय है | क़त्ल खानों में जाने वाली गायों को रोकने के लिए उनके गोबर, गोमूत्र से पंचगव्य उत्पाद बनाकर तथा खेती में प्रयोग होने वाली गोबर खाद व कीट नियंत्रक बनाकर गाय को बचाया जा सकता है और उनकी सेवा की जा सकती है | इस उद्देश्य से एक गौशाला और पंचगव्य उत्पादों का उत्पादन और प्रशिक्षण करने की योजना है और गाँव-गाँव में उनकी जानकारी पहुंचे इसकी तैयारी चल रही है |
आप सभी के साथ से ही यह शुभ कार्य सफल होगा |
इसमें तन, मन, धन का सहयोग अपेक्षित है |
गाय का दूध बहुत ही पौष्टिक होता है। यह बीमारों और बच्चों के लिए बेहद उपयोगी आहार माना जाता है। इसके अलावा दूध से कई तरह के पकवान बनते हैं। दूध से दही, पनीर, मक्खन और घी भी बनाता है। गाय का घी और गोमूत्र अनेक आयुर्वेदिक औषधियां बनाने के काम भी काम आता है। गाय का गोबर फसलों के लिए सबसे उत्तम खाद है। गाय के मरने के बाद उसका चमड़ा, हड्डियां व सींग सहित सभी अंग किसी न किसी काम आते हैं।

अन्य पशुओं की तुलना में गाय का दूध बहुत उपयोगी होता है। बच्चों को विशेष तौर पर गाय का दूध पिलाने की सलाह दी जाती है क्योंकि भैंस का दूध जहां सुस्ती लाता है, वहीं गाय का दूध बच्चों में चंचलता बनाए रखता है। माना जाता है कि भैंस का बच्चा (पाड़ा) दूध पीने के बाद सो जाता है, जबकि गाय का बछड़ा अपनी मां का दूध पीने के बाद उछल-कूद करता है।
गाय न सिर्फ अपने जीवन में लोगों के लिए उपयोगी होती है वरन मरने के बाद भी उसके शरीर का हर अंग काम आता है। गाय का चमड़ा, सींग, खुर से दैनिक जीवनोपयोगी सामान तैयार होता है। गाय की हड्‍डियों से तैयार खाद खेती के काम आती है।
शारीरिक संरचना : गाय का एक मुंह, दो आंखें, दो कान, चार थन, दो सींग, दो नथुने तथा चार पांव होते हैं। पांवों के खुर गाय के लिए जूतों का काम करते हैं। गाय की पूंछ लंबी होती है तथा उसके किनारे पर एक गुच्छा भी होता है, जिसे वह मक्खियां आदि उड़ाने के काम में लेती है। गाय की एकाध प्रजाति में सींग नहीं होते।
गायों की प्रमुख नस्लें : गायों की यूं तो कई नस्लें होती हैं, लेकिन भारत में मुख्‍यत: सहिवाल (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, बिहार), गीर (दक्षिण काठियावाड़), थारपारकर (जोधपुर, जैसलमेर, कच्छ), करन फ्राइ (राजस्थान) आदि हैं। विदेशी नस्ल में जर्सी गाय सर्वाधिक लोकप्रिय है। यह गाय दूध भी ‍अधिक देती है। गाय कई रंगों जैसे सफेद, काला, लाल, बादामी तथा चितकबरी होती है। भारतीय गाय छोटी होती है, जबकि विदेशी गाय का शरीर थोड़ा भारी होता है।
भारत में गाय का धार्मिक महत्व : भारत में गाय को देवी का दर्जा प्राप्त है। ऐसी मान्यता है कि गाय के शरीर में 33 करोड़ देवताओं का निवास है। यही कारण है कि दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर गायों की विशेष पूजा की जाती है और उनका मोर पंखों आदि से श्रृंगार किया जाता है।
प्राचीन भारत में गाय समृद्धि का प्रतीक मानी जाती थी। युद्ध के दौरान स्वर्ण, आभूषणों के साथ गायों को भी लूट लिया जाता था। जिस राज्य में जितनी गायें होती थीं उसको उतना ही सम्पन्न माना जाता है। कृष्ण के गाय प्रेम को भला कौन नहीं जानता। इसी कारण उनका एक नाम गोपाल भी है।
निष्कर्ष : कुल मिलाकर गाय का मनुष्य के जीवन में बहुत महत्व है। गाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तो आज भी रीढ़ है। दुर्भाग्य से शहरों में जिस तरह पॉलिथिन का उपयोग किया जाता है और उसे फेंक दिया जाता है, उसे खाकर गायों की असमय मौत हो जाती है। इस दिशा में सभी को गंभीरता से विचार करना होगा ताकि हमारी 'आस्था' और 'अर्थव्यवस्था' के प्रतीक गोवंश को बचाया जा सके। 

Saturday, 1 August 2015

कृषि व्यवस्था का स्वदेशीकरण

 कृषि व्यवस्था का स्वदेशीकरण


भारतीय खेती१) भारतीय ग्राम समाज में मिलने वाले गोबर, गौमूत्र और अन्य जैविक पदार्थो से सेंद्रीय खाद बनाना चाहिए

फर्टिलाइजर के कारखानों को जो सहूलियत व सबसिडी मिलती है, वह बंद होनी चाहिए । पिछ्ले पचास सालों में रासानिक फर्टिलाइजर को प्रोत्साहित करके सरकार ने भारत की खेती का भारी नुकसान किया है । हमें इस बात का पूरा अनुभव मिल चुका है कि रासायनिक खाद आगे चलकर लंबे समय के लिए नुकसानदेह है और ये जमीन की उर्वरता को खत्म कर देते है । इसलिए ज्यादा खाद डालते हुए भी प्रति एकड़  उत्पादन कम हो रहा है । इसके बदले हमारा गोबर खाद, सेंद्रीय खाद उत्तम है, यह साबित हो चुका है । इसलिए रासायनिक खादों को किसी भी प्रकार का प्रोत्साहन नहीं मिलना चाहिए और सेंद्रीय खाद को तमाम प्रकार के प्रोत्साहन मिलने चाहिए । ताजातरीन शोधों के मुताबिक एक किलो गोबर में से ३० से ३५ किलो जितना ही गुणकारी सेंद्रीय खाद बन सकता है । इस तरह तमाम ग्रामवासियों को अवकाश के समय में सेंद्रीय खाद बनाने में लगाया जाए तो भारत में सेंद्रीय खाद से अत्यंत उपयोगी व समृद्ध हो सकती है । साथ ही इससे जमीन की उर्वरता भी खूब बड़ जायेगी और प्रति एकड़ उत्पादन पूरे विश्व में हम उच्चतम ले सकते है । इतनी बड़ी संभावना हमारे देश में है परंतु उसका उपयोग किया नहीं जाता। ऐसा करने के लिए रासायनिक खाद के ऊपर प्रतिबंध होना चाहिए और एक किलो गोबर से ३० किलो सेंद्रिय खाद बनाने की पध्दति का खूब जोर - शोर से गांव में प्रचार करके ऐसी खाद करोड़ों और अरबों टन बनाने की व्यवस्था करना जरुरी है ।

२) भारतीय ग्राम्य समाज में उपलब्ध गौमूत्र, नीम और दूसरी वनस्पतियों का उपयोग करके कुदरती कीटनाशक दवाएं बनाना और वही खेत में उपयोग करना तथा पेस्टीसाइड्स के कारखाने पर प्रतिबंध

आधुनिक खेती में रासायनिक कीट्नाश्कों ने खेती का सत्यानाश कर रखा है । अभी भारत में हर साल २० हजार करोड़ रु. की कीट्नाशक दवएं किसान उपयोग करता है । यानी किसानों के घरों में से बेशकीमती २० हजार करोड़ रु. के कीटनाशकों के रुप मे चले जाते है । इसलिए किसान बदहाल हो जाता है और बहुत सारे किसानों को आत्महत्या करनी पड़ती है । रासायनिक दवाओं के कारण जमीन का नाश होता है सो अलग और उत्पादन भी कम होता है । कीटनाशक दवाओं बाला खाद्य पदार्थ खाने से तमाम लोगों को कैंसर जैसी बीमारी भी हो जाती है । इसलिए दवाओं में और डाक्टरों पर काफी पैसे खर्च हो जाते है । इस प्रकार के दुश्चक्र में भारत के किसान और भारत की जनता फंस गयी है । कृषि व्यवस्था के स्वदेशीकरण से इस जहरचक्र को तोड़ डालना चाहयें । यह कार्य सचमुच कठिन नहीं है, क्योकि महंगे रासायनिक कीटनाशक दवाओं के बदले स्थानीय बनस्पतियों से घर में कीटनाशक दवाएं बिल्कुल मुफ्त में बना लेना सरल है और हर किसान बहुत कम खर्च में यह कर सकता है । बनस्पतियों से घर में बनने वाली कीटनाशक दवाएं किसानों द्वारा खुद बनाने के तरीके का प्रचार होना चाहिए । यह बहुत जरुरी है ।  ऐसा हो तो किसान ऐसी दवाएं खुद बनाकर लाखों करोड़ों रुपयों के शोषण से बच सकते है । अपनी खेती की जमीन को खराब होने से बचा सकते है और जनता को कीटनाशक वाली सब्जी, भाजी, अनाज, फल, दलहन से जो कैंसर होता है, उससे बचा सकते है ।

३) पहाड़ों में से मिलने वाले पत्थर तथा अन्य स्थानों से मिलने वाली प्राकृतिक मिट्टी में जो खनिज तत्व है उनका उपयोग कृषि में होना चाहिएं

४) खेती के काम में जरुरी साधन-उपकरण आदि बनाने के लिए लोहार, बढाई वगैरह लोगों को प्रोत्साहन मिले ऐसी नीति

५) भारतीय कृषि परंपराओं में उपयोगी हो ऐसे बीज का संरक्षण और पुनर्गठन

बीज को पवित्र वस्तु मानने की परंपरा भारत में थी । उसकी खरीद-बिक्री नहीं होती थी । मित्र परिवार और सगे- संबंधी से लेन-देन करके आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी । अक्सर किसान अपना बीज स्वयम् चुन-चुन कर रखते थे ।

१९६० से हरित क्रांति के दौर में जहां पहले भारत में ४० हजार धान की, चार हजार गेहूं की, एक हजार आम की किस्में थी वे अब बहुराष्टीय कंपनियों को तरजीह देने कारण एक दर्ज तक सिमट गई है । इसलियें हमें अपने पारम्परिक बीजों की सुरक्षा और उत्पादन करने ही होगें ।

६) देशी बीज मिलें  ऐसे २५-५० गांवों के समूह में बीज का उत्पादन व वितरण की सुविधा ।

७) खेती का पारंपरिक ज्ञान जो भारतीय किसानों को है, उसका संकलन और प्रचार तथा भारतीय भाषाओं में प्रकाशन ।